हाल ही में एक मित्र को मैंने मेरा पसंदीदा नॉवेल दी, उसके पन्नें पलटते हुए मेरी नजर पड़ी '76वा संस्करण' । यह साधारण बात हो सकती थी लेकिन फिर साहित्य की भव्यता का बोध हुआ। आदमी के जीवन का कोई मनोभाव साहित्य से अछूता नहीं है।
साहित्य और कला हमेशा से मनोरंजन के सरलतम माध्यम रहें है।करीब दो दशक पहले तक तो ऐसा ही था। मन के हर एक भाव की तस्वीर साहित्य में मिलती है, फिर भी एक अवांछनीय दूरी बनाती जा रही है, खासतौर पर आज के युवाओं में।
बीते दशक के साथ एक सवाल के उत्तर का भी धुंधला और बदलता हुआ प्रतीत हुआ है। एक दौर था जब पसंद नापसंद और 'हॉबी' पूछने पर एक बड़े समूह का जवाब किताबें पढ़ना होता था। अब यह जवाब का दायरा सिमट सा गया है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी कहते हैं "साहित्य जनता की चित्तवृत्तियों का संचित प्रतिबिम्ब होता है "।
आज के दौर के युवा का चित्त विचित्र होता जा रहा है, बढ़ती तकनीक का स्तर घटते संवेदनशीलता की ओर देखा जा सकता है।
आज के युवा के लिए साहित्य का स्तर और समझ सोशल मीडिया तक सीमित है। अपनी व्यथा और कथा दोनो ही सोशल मीडिया के हवाले से सुनाना आम हो गया है।
हमे जरूरत है उस चौकोर सतरंगी चकाचौंध से फुर्सत लेने की जिसकी छः इंच की स्क्रीन में 7 अरब की दुनिया बंद है।
1476 में William Caxton ने प्रिंटिंग प्रेस की तकनीक से माध्यम से साहित्य का प्रसार किया लेकिन अब अतिवादी तकनीक साहित्य के ही गले पड़ इसको समेटने लग गई है।
इस नूडल वाले एरा में सोंधी रोटी जैसा है साहित्य।
गीत ग़ज़ल कहानियां कविताएं उपन्यास, आपकी स्वाद की इंद्रियों के लिए हर एक रस है इसके पास।
गोरख पांडेय कहते हैं "जब तक आप अपने जड़ों के नजदीक नहीं पहुंचते तक तक आप वैश्विक नही हो सकते है।" तो आइए अपने मूल पर लौटें अन्यथा कोई Ferdinand de Saussure पाणिनी का व्याकरण पढ़ Linguistic जैसा विषय ही बना दे और हम अपनी वर्चुअल दुनिया में ही फ्रस्ट्रेट होते रहें।
लेखक:
प्रवीण कुमार
(एम.ए. इंग्लिश, BHU


No comments:
Post a Comment