बहुत ही आम सी बात है हमारे इंडिया में कि जैसे-जैसे बेटे-बेटियां उम्र में, ओहदे में बड़े होते जाते है, वैसे-वैसे उनके माँ-बाप उनकी नजरो में गवार, अनपढ़,असभ्य,और सठिया जाते है, और तो और बहु का रवैया तो उनके प्रति और भी गंदा हो जाता है । मैंने बहुत से दादा-दादी की आपबीती उनके ही मुंह सुनी है कि उनकी बहु सही तरीके से बात करने को तो छोड़िये, मारने- पीटने तक पर आ आती है। और उनका अपने खून का बेटा बैठे-बैठे सब तमाशे की तरह देखता रहता है।
हमारे इंडिया में अनगिनत "ओल्ड ऐज हाउस" हैं जहां अपने परिवार से सताये, छोड़ दिए गए बुजुर्गजन अपने अंतिम समय को कोसते है,और भगवान से प्रार्थना करते रहते हैं कि उनके बेटे- बेटियो, बहु-पोतो को खुश रखना, जिनकी वज़ह से आज वो अपने ही हाथो से बसाए घर में रहने को तरस रहे होते है।
नौकरी मिलने, घर बनाने, शादी होने के बाद लोगो के पास इतना वक्त नही होता कि वो अपने माँ बाप को अपने साथ रख सके, जिंदगी के अंतिम वक्त में उनके चेहरे पर मुस्कान ला सके, और उन्ही के खून पसीने से सींचे परिवार में परिवार का अहसास करवा पाये।
कितनी गंदी फितरत होती है इंसान की, कि बहुत जल्दी भूल जाता है कि जब उन्हें चलना नही आता था तो इन्ही हाथो ने हाथ पकड़ कर चलना सिखाया था।
जब खाना खाने नही आता था तो इन्ही हाथो ने खाना खिलाया था।
जब नींद नही आती थी तो इन्ही आवाजो ने लोरियां सुनाई थी,जो आज टर्र-टर्र सी लगती है।
जब कोई औकात नही थी तब इन्ही के हौसलो ने उड़ना सिखाया था।
जब कोई पहचान नही थी तब इन्होंने हमे अपना नाम दिया था।
मेरा बेटा कलेक्टर बनेगा बोल-बोल के माँ ने कलेक्टर बनाया था।
और आज जब सब कुछ हासिल हो जाता है तो साथ वही नही होते जिनकी वजह से ये सब कुछ हासिल हो पाया।
"ओल्ड ऐज हाउस""खोल देना बहुत अच्छी बात नही है, बुजुर्ग माँ बाप की जगह वृद्धाश्रम नही उनका खुद का घर होना चाहिए।
परंतु जब तक ये बात देश के हर बेटे और बहू को समझ आये तब तक तो "ओल्ड ऐज हाउस", "वृद्धाश्रम" एक वरदान और अधूरे सपने को पूरा करने के अधार की तरह होता है।
मेरा अपील है कि बदलते समय के साथ माँ-बाप के प्रति अपने कर्तव्यों को ना बदलने दे। सच्चे ईश्वर की भक्ति उनकी सेवा और उनकी इज्जत करने में है।
एक बुजुर्ग दादा जी ने बताया कि बेटा इस उम्र में कुछ नही चाहिए बस जरा सा इज्ज़त और प्यारी सी बोली ही काफी है।

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